मेरे तो गिरधर गोपाल : Meera Bai मारग में तारण मिले संत नाम दोई। संत सदा सीस पर नाम हृदै सब होई॥ अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई। दासि मीरा लाल गिरधर, होई सो होई॥
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई : भक्तिकालीन कवयित्री मीराबाई हिन्दी भक्तिकालीन में मीरा की भक्ति प्रेम की पराकाष्ठा को प्राप्त है। इनके काव्य में मानवीय प्रेम की अपार व्यापकता और विविधता है। प्रेम की काव्यानुभूति, जीवनानुभूति और भक्ति की अनुभूति का केन्द्रीय तत्त्व है। इनकी भक्ति प्रेम और मानवीय सरोकार से जुड़ा हुआ है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में कवयित्री मीरा का ‘प्रेम’ प्रेरणास्रोत है। स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा तथा छटपटाहट इनकी रचनाओं में बखूबी व्यक्त हुआ है। मीराबाई का मानना है कि मन से हरि के शरण में अपने आपको समर्पित कर दो। उनके शरण में जाने पर ही यह जीवन सौन्दर्यमयी होगा। श्रीकृष्ण की शरणागति में मनुष्य के दैहिक, दैविक और मानसिक दुःख दूर हो जाते हैं। इनकी भक्ति को प्रह्लाद ने अनुभति किया तो वे इन्द्र की पदवी को धारण कर लिया और ध्रुव ने रसपान किया तो वे अटल बन गये। निश्चित रूप से श्रीकृष्ण ऐसे भक्तों को शरण देते हैं, जो निराश्रित हैं और श्रीकृष्ण नख से शिख तक जो शोभा को धारण करने वाले हैं। गोपों की रक्षा के लिए इन्होंने गोवर्धन धारण किया और इन्द्र के गर्व का हरण किया। इसी कारण वश मीरा भी गिरधर लाल की दासी बन गयी। मीरा का मानना है कि उनके आराध्य श्रीकृष्ण अपार संसार सागर से पार कराने वाले तारनहार हैं। इसीलिए मीरा कहती हैं कि-